उड़ान

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सुखिया अब कौवों को उचरा-उचरा कर थक चुकी थी. सुबह घर-आँगन बुहारते समय जैसे ही किसी कौवे की काँव-काँव सुनती, झाड़ू छोड़कर, कौवे की ओर मुखातिब होकर, उससे बतियाने लगती. झुंझलाकर कहती, “क्या झूठ का कांव-कांव करके परेशान करता रहता है? (उसने दादी, माँ, चाची, भाभी आदि के मुख से  बचपन से सुना था कि कौओं के कुरचने तथा आहार बांटने में किसी अपने आदमी के आने का संदेश छिपा रहता है.) तुम सब क्या खाते हो कि तुम्हारे काँव-काँव का कोई भी अर्थ ही नही निकल पाता?”

दूर खड़ी, काफ़ी देर से स्थिति का अवलोकन करती, मुँहबोली ननद ने चुटकी लेते हुए कहा, ”भउजी! इनका काला रंग नहीं देखतीं क्या? इनके पंख इतने काले हैं, तो दिल कितना काला होगा!” 

यह सुनकर पहले तो सुखिया एक पल के लिए झेंप गयी, लेकिन तुरत, अपने सांवलेपन के पक्ष  को मजबूत करने के लिए कहा, “बबुनी! इन काले कौवों के विषय में तो मैंने बचपन से सुना है कि इनका रंग भले ही काला है, लेकिन, ये दिल के साफ होते हैं. गोरा रंग तो मन में गुमान भरता है! संसार में आग लेसने लगाने वाले सारे धंधे तो गोरी चमड़ी वाले ही करते हैं! यही सोच-सोच के तो कलेजा कांपता रहता है. तुम्ही देखो न! तुम्हारे भैया का गोरा रंग, हरदम हँसता-मुस्कुराता चेहरा, गठीला-लम्बा-छरहरा बदन और इतने सरल स्वभाव वाले आदमी पर किसी तरह का संदेह करने का मन नहीं होता, लेकिन, रह-रह कर मन संदेह में उलझ जाता है. कहावत है, “जहाँ नर बटही नारी बाज उहें समझना तिरिया राज तिरियाराज.”

सुखिया की ननद सलोनी बारहवीं कक्षा की छात्रा थी. पढ़े-लिखे होने का गुमान उसके हाव-भाव से झलकने लगा था. संचार-व्यापार के इस युग में जब सूचना-संप्रेषण का विश्वव्यापी बाजार गर्म है, बचपन से ही हाथ में मोबाइल नचाते बच्चे अब असमय परिपक्व होने लगे हैं. यही कारण था कि सलोनी अपनी भाभी की पीड़ा भली-भाँति समझ रही थी. दो बच्चों के जन्म के बाद से उसके भाई के मुखड़े से हँसी उतरने लगी थी. उसकी शादी में गहना-गुरिया, गाजा-बाजा, भोज-भात आदि करने में जो साव का कर्ज सर पर चढ़ा, वह दिन पर दिन चाँद की तरह बढ़ रहा था. खेत की उपज बेंचने पर भी पूरा ब्याज सधाना सम्भव नहीं था. घर के दैनिक चर्चे में  कर्ज का बोझ और उसकी शादी की चिंता दोनो ही शामिल हो गये थे.

सलोनी की माँ, लालमती, और पिता, भगेलू राय के चेहरों पर चिंता की छाया साफ़ दिखने लगी थी. राघव को सोते-खाते न भोजन का स्वाद समझ में आता, न चैन की नींद ही कभी आ पाती थी. उसने बहुत सोचने-समझने के बाद घर की दीवार पर लगी कर्ज की कालिख को हटाने के लिए आसाम जाने का निर्णय ले लिया.

गाँव के रिश्ते के चाचा शिवप्रसाद, वर्षों बाद आसाम से कमाई करके लौटे थे. राघव ने एक दिन अलाव पर हाथ सेकते समय एकान्त में उनसे संकोच भरे स्वर में  कहा, “चाचा जी, मैं भी आपके साथ आसाम चलना चाहता हूँ. मुझे वहां कोई मिहनत-मजूरी वाला काम दिलवा देंगे, तो आपकी बड़ी कृपा होगी.”

शिवप्रसाद ने कुछ देर की चुप्पी के बाद कहा, “देख बबुआ! अपनै गाँव-समाज और माटी-पानी का सुख, संसार में कहीं नहीं मिलेगा. तुम्हारे पास तो भगवान की दया से पेट भरने लायक जमीन जायदाद है, उसी में पसीना गारकर सोना पैदा कर सकते हो. परदेस में मालिक-महाजन जितना पैसा देता है उसके दूना खून जलवा देता है. आँख घुमाकर देख लो, आसाम का पानी कितने लोगों की जवानी को चाट गया. अपने देश की धरती कम सुन्दर नहीं है. अपने देश को प्रभु ने रंगोली की तरह सजाया है, लेकिन खून पीने वाले जोंक तो जहां कहीं थोड़ी नमी है, वही जनम जाते हैं, और श्रमिकों की  खून-पसीने की सोंधी गंध पाकर छपटकर रग-रग चूस लेते हैं. हाड़तोड़ मेहनत करने वाला मजूरा भी ठीक से धर भर का भोजन -वस्त्र नहीं जुटा पाता. सो, मैं तो कहूँगा, तुम यहीं रहकर माई-बाबू की सेवा, और बच्चों की देखभाल करते हुए, अपना भाग्य सँवारो.”

इतना सबकुछ सुनकर भी, राघव ने कातर स्वर में कर्ज के बोझ और बहन की शादी की चिन्ता को जब शिवप्रसाद के सामने रखा, तब शिवप्रसाद ने लम्बी सांस खींचते हुए कहा, “तो ठीक है, चलो बबुआ, अपने साव से कहकर मैं तुम्हें आटा-चक्की में काम लगा दूँगा.”

शिवप्रसाद की बात सुनकर राघव के चेहरे पर हर्ष छा गया. उसने उल्लसित होकर पूछा, “कब यात्रा है काका?” शिवप्रसाद ने कहा, “सारी तैयारी कर लो, एक सप्ताह बाद, अगले बुधवार को गौहाटी-लखनऊ एक्सप्रेस को पकड़ना है. और हां, एक पखवारे भर के जरुरी खर्चे के लिए कुछ पैसे रख लेना. वैसे मैं तो हूँ ही.”

राघव ने “जी, काका!” कहा और तेज-तेज कदमों से चलते हुए अपनी माँ के पास पहुँचकर एक ही सांस में उसके आसाम जाने की तैयारी कर देने का आग्रह किया. उसकी माँ, लालमती, के मुख से सुनते ही निकला, “हे, भगवान् ! तुम्हारे मग पर ई कौन भूत चढ़ा दिया? तू बाहर चला जायेगा तो खेती-बारी कौन देखेगा?”

राघव ने माँ को चुप करातै हुए कहा, “थोड़े दिनों की तो बात है माँ! साल-दो-साल में कर्ज सधाने, और सलोनी की शादी करने के बाद, मैं फिर यहाँ घर सम्भाल लूँगा.”

इस बीच शिवप्रसाद से, राघव के पिता, भगेलू राय को राघव के आसाम जाने की सूचना मिल चुकी थी. उन्होंने सलोनी को पुकार कर दूध की भरी बाल्टी थमाते हुए, सबको सुनाकर कहा, “अरे, राघो शिवप्रसाद के साथ आसाम जाना चाहता है तो जाने दो. घर में बाहर के चार पैसे आने से कर्ज सधाने में खेत तो नहीं बिकेगा!”

इतना सुनने के बाद घर-आँगन में सन्नाटा पसर गया था. राघव की यात्रा वाला सप्ताह, उसके घर के हर सदस्य के सर पर भारी था. राघव के अपने से दूर हो जाने का तनाव सम्बन्ध की प्रगाढ़ता के पैमाने पर सारे सदस्य माप रहे थे. नियत तिथि को जब राघव घर से निकल रहा था, सुखिया को प्यार से सहलाकर शीध्र लौटने का उसने भरोसा दिया था. उसकी भरी-भरी आँखों को गमछे से पोंछ, फफकते-फूटते चेहरे को सीने से लगाते हुए कहा था, “तू यह क्या कर रही है? इस तरह गंगा-यमुना बहाएगी, तो मैं नहीं जा सकूँगा. अब से घर-गृहस्थी का सारा भार तेरे ऊपर ही ह़ै. माँ-बाबूजी, सलोनी और बच्चों पर ध्यान देना. मैं सबके लिये पैसे भेज दिया करूँगा.”

फिर, बच्चो के सर पर स्नेहभरा हाथ फेरकर, बहन की पीठ थपथपाते हुए, माता-पिता के पाँव छूकर, सबसे नजर बचाते हुए राघव तेजी से घर से निकल पड़ा था. 

आसाम के नवगाँव पहुँचने पर उसे शिवप्रसाद ने काम पर रखवा दिया था. दिहाड़ी मजदूर के रुप में दिन-रात मिहनत-मजूरी कर, उसने घर का पूरा कर्ज सधा दिया था. बहन की शादी के लिए भी घर पैसे भेजे थे. हर महीने बच्चों की पढ़ाई के पैसे तथा हर तीज-त्योहार पर घर भर की जरुरत के कपडे भी उसकी तरफ़ से आते रहे थे. घरेलू उपभोग की गाड़ी का पहिया बिना किसी तरह की चरमराहट के सहजता से चल रहा था. इस बीच शिवप्रसाद दो बार घर आये और गये, और दोनो बार, राघव ने पैसे और हर सदस्य की पसन्द के सौगात उनके द्वारा भेजे.

राघव की माँ ने दोनो बार शिवप्रसाद से पूछा, “बबुआ को साथ क्यों नहीं लाये?” 

शिवप्रसाद ने हँसते हुए कहा, “भाभी! अब जमाना बदल गया है. नेह-नाता पर पैसा भारी पड़ रहा है. देखा-देखी धनिक बनने के फेर में सम्बन्धों के डोर टूट रहे हैं. क्या ही कहें भाभी, मैं तो अपना और  बच्चों के पेट भरने के लिए अपनी माटी छोड़कर इतनी दूर कमाने गया था. साँच कहें भाभी, तो मेरा मन उधर, एक दिन नहीं लगा. देह वहां खटता था और मन प्राण बंटकर यहाँ भटकता था. रघउआ के सर पर तो पैसा कमाने का भूत सवार है. आने के सभय मैंने कहा भी कि, चलो, एकबार गाँव घूमकर आ जाव, मनफेरवट हो जायेगा, तो उसने दोनों बार यही कहा, “ना चाचा! सलोनी की शादी कै लायक पैसा पूरा हो जाय तब घर चलेंगे.”

यह सुनकर लालमती ने कहा, “अब का कहें बबुआ, हमरा बाबू तो काला पानी पी रहा है. हमलोगन का मुँह चिकना करने के लिए हमरा छाती के गारल सारा रकत को जरा रहा है. आपसे एक विनती है बबुआ, इसबार किसी तरह समझा-बुझाकर जरुर साथे लेते आईएगा!” इतना कहते ही लालमती की आँखें भर आईं. शिवप्रसाद से इस बार साथ लाने का वादा सुनकर वे आँचल से आँखें पोंछती घर लौटीं.

उधर सुखिया दिन-रात सपनाती रहती. बचपन से गाँव-घर में पूरब के जादू-टोना करके मर्दों को दिन में  सुग्गा बनाने और रात में पुनः आदमी बाना देने की कथा अब उसे सच लगने लगी थी. ऊपर से उसका सांवला रंग अब चमड़ी पर खुरसानी मिर्च की तरह लहरने लगा था. कई बार तो उसने अड़ोस-पड़ोस की महिलाओं के कहने पर घर के लोगों से छुपकर तांत्रिकों पर ‘मोहिनी मंत्र’ के असर काटने हेतु जाप के नाम पर अपनी संचित राशि लुटा दी थी. एक असहाय नारी अभाव से अधिक भाव से भरने पर कमजोर होती है. ये धधकती ज्वाला में कम, उपेक्षा की आँच में अधिक जलतीं हैं. सुखिया ने अपनी सहेलियों के बीच रहते हुए गाँव से मेला तक नाचती नजरों की तुला पर गोरे-सांवले रंगों के प्रभाव का भार समझ लिया था. शादी के समय भी राघव के गोरे रंग और आकर्षक व्यक्तित्व को देखकर प्रशंसा की फुहार छिड़कने वाली सहेलियों के कलेजे से निकलने वाली जलन की गंध को उसने सूंघा था. तभी से, हर गोरी औरत में उसे सौतन दिख जाती थी.

राघव कभी भी टेलीफोन पर एक तो जल्दी किसी से बात नहीं करता था, और जब भी बात करता तो सबका हाल जानने के बाद  कह देता, “मैं ठीक हूँ.” घर आने की बात पूछने पर वह जबाब को मूँह में ही चबाकर चुप हो जाता. राघव अपने सपनों की बेदी पर भरी जवानी की सारी शक्ति हवन करने पर उतारु था. शिवप्रसाद भी उसे स्वास्थ्य पर ध्यान देते हुए श्रम करने की सलाह देते रहते; लेकिन, वह हमेशा “हूँ-हाँ” में जवाब देकर खिसक जाता. दिन-रात की पालियों में काम करके अधिक से अधिक कमाकर पक्की छत वाला घर और एक मोटरसाईकिल खरीदने का सपना न उसे ठीक से खाने देता और न सोने देता था. वह रात को जब भी बिछावन पर जाता, टभकती-टटाती हड्डियों को सहलाकर, जैसे-तैसे सोने का प्रयास करता. ऐसे क्षणों में सुखिया उसे सुख के पलने-सी दिखने लगती थी. खेतों की जोतनी-रोपनी और कटनी के दिनों में जब सुखिया की तेल से तर हथेलियाँ उसके सर से पाँव तक फिसलतीं, तो लगता कि वह अंग-अंग की ऐंठन हथेलियों से पोंछकर उसके शरीर बाहर फेंक रही हो. इन्ही स्मृतियों की डोर थामकर वह गाँव पहुँचता और हर सदस्य के प्यार के बदले अपने सपने के महल में उसकी पसन्द का स्थान निर्मित करते हुए सो जाता.

इस सदी के दुनियाभर के युवकों की तरह राघव भी इस सत्य से अपरिचित था कि लोहे का दिमाग तो बन सकता है, लेकिन, किसी भी ज्ञात-अज्ञात धातु से दिल नहीं बनाये जा सकते! इस औद्योगिक युग ने गाँवों के युवकों को आकाश छूने के सपने तो दिये, लेकिन, पाँव के नीचे से अपनेपन और प्यार की सरस जमीन खींच ली. यंत्रमानव गढ़ते-गढ़ते मानव खुद यंत्रवत होता गया. सुख के सपने बोने वालों ने भठ्ठी की आग में गले-तपे लाल लोहे पर श्रमिक वर्ग के खून-पसीने का पानी चढ़ाकर चाँदी काट ली और दुनिया भर के मजदूर मृगतृष्णा में एक छोर से दूसरे छोर तक दौड़ते रहे. आटा-चक्की की पिसाई में हर दिन अपना खून जलाता राघव शक्तिसुधा आटा की बोरियाँ सजा-सजा कर स्वयं शक्तिहीन हो गया था.  

उधर सुखिया का अवसाद धीरे-धीरे गहरा होता जा रहा था. वह बिना बात हर किसी से लड़ने-झगड़ने लगी थी.

इसी मानसिक स्थिति में वह रोज कौवों को उलाहना देते हुए एक ही बात कहती थी, “अपने आदमी पर से तो भरोसा उठ ही गया है, अब तुम पंछियों पर भी विश्वास नहीं रहा. उन्हें वह प्रलोभन देती हुई कहती, “थोड़ा भी लाज-शर्म है तो उड़कर आसाम जा और राजू के बाप को बुला ला, मैं तुझे रोज-रोज भर-भर कटोरी दूध-भात दूँगी.”

और जिस रोज पिलियाग्रस्त राघव ने शिवप्रसाद का सहारा लेकर आँगन में कदम रखा था, उसे देखते ही सुखिया की रगों का सारा खून पानी हो गया था. सांवला चेहरा सफेद हो गया था. “हाय राम!” कहकर वह दहाड़मारती गिरी और बेहोश हो गयी थी. राघव को देखकर लग रहा था कि उसके सपनों के उड़ जाने से वह  वहां उपस्थित हर चेहरे में अपने सपने ढूंढ रहा है.

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हिन्दी कहानी
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अनकही
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Harindra Himkar

साहित्यिक गतिविधियाँ : अज्ञेय की संस्था ‘वत्सल निधि’ से सम्बद्ध, जय-जानकी जीवन यात्रा का सहभागी. भारत-नेपाल की अनेकों भोजपुरी पत्र-पत्रिकाओं में रचना प्रकाशित. हिन्दी बालगीत ‘प्यारे गीत हमारे गीत’ प्रकाशित. हिन्दी तथा भोजपुरी भाषा में नियमित लेखन. कविताओं तथा गीतों का एक संकलन प्रकाशन की प्रतीक्षा में. प्रज्ञा-प्रतिष्ठान नेपाल, नेपाल भोजपुरी समाज तथा हिन्दी साहित्य समाज के कार्यक्रम में नियमित सहभागिता. हिन्दी तथा भोजपुरी पत्रिकाओं का सम्पादन. भारतीय राजदूतावास, नेपाल की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का नियमित सहयोगी-सहभागी. बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय में हिन्दी तथा भोजपुरी भाषा साहित्य विषय पर शोध का निर्देशन. नेपाल के भोजपुरी भाषा और साहित्य विषय पर शोध का निर्देशन. अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन का स्थायी सदस्य.

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